सोमवार, जनवरी 22, 2018

बसंत के आने की आहट

सफर से लौटकर
आने की आहटों से
चोंक गए
बरगद, नीम, आम
महुओं का
उड़ गया नशा
बड़े बड़े दरख्तों के
फूल गए फेंफड़े

हर तरफ
कानों में घुलने लगा शोर
कनखियाँ
खोलने लगी
बंधन के छोर

फूलों की धड़कनों को
देने उपहार
खरीदकर ले आया मौसम
सुगंध उधार
फूलों में आ गयी
गुमशुदा जान

सूख गए पनघट पर
ठिठोली की जमघट
बिन ब्याहे सपनों ने
ले ली है करवट

प्रेम के रोग की
इकलौती दवा
आ गयी इठलाती
बासंती हवा----

" ज्योति खरे "

मंगलवार, जनवरी 16, 2018

गंगा की छाती पर

गंगा की छाती पर
**************
गंगा की छाती पर
जब भरने लगता है महाकुंभ
महाकुंभ में बस जाती हैं
कई कई बस्तियां
बस्तियों में सम्मलित हो जाती हैं हस्तियां

हस्तियां उजाड़ते आती हैं
कई कई अधबनी बस्तियां
बसने को आतुर बस्तियां

अरकाटीपन,बनावटीपन
चिन्तक की चिंता
तरह तरह के गुरु मंत्र
टांगकर चली जाती हैं हस्त्तियाँ
और टनांगकर चली जाती हैं
छलकपट की दुकानों पर
आध्यात्म की तख्तियां

हिमालय की कंदराओं से निकलकर
आ गये हैं नागा बाबा
देह पर जमी हुई
दीमक छुड़ाने
चमकने लगे हैं
जंग लगे हथियार अखाड़ों में

जारी है
पवित्र होने का संघर्ष

गंगा
बहा रही है अपने भीतर
पूजा के सूखे फूल
जले हुये मनुष्य की
अधजली अस्थियां
कचड़ा,गंदगी
थक गयी है
पापियों के पाप धोते-धोते

कर्ज की गठरी में बंधा
खिचड़ी,तिल,चेवडा
बह रहा है गंगा में
चुपड़ा जा रहा है
उन्नत ललाट पर
नकली चंदन
संतों की भीड़ में लुट रही है
आम आदमी की अस्मिता

गंगा
पापियों के पाप नहीं
पापियों को बहा ले जाओ
एकाध बार अपने में ही डूबकर
स्वयं पवित्र हो जाओ---

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, जनवरी 12, 2018

ठंड

ठंड
****
1
सहमी शरमाई सी
दिनभर खड़ी रही
धूप
ठंड
दुबककर रजाई में
शाम से पी रही
टमाटर का सूप--
2
टपक रही सुबह
कोहरे के संग
सूरज के टूट रहे
सारे अनुबंध--
3
कड़कड़ाते समय में
दौड़ रही घड़ी
अदरक की चाय
अंगीठी पर चढ़ी---
4
आलिंगन को आतुर
बर्फीली रातें
गर्माते होंठ
कर रहे
जीवन की बातें--
5
ना जाने की जिद पर
कपकपाती धुंध
दरवाजे पर अड़ी
खटिया खड़ी--

"ज्योति खरे"

रविवार, दिसंबर 31, 2017

वादों का मफ़लर

लपेटकर रख लिया है
तुम्हारे
ऊनी आसमानी शाल में
पिछला साल

उम्मीद थी
कि, बर्फ़ीली हवाओं में
ओढ़ कर बैठेंगें
और जाती हुई नमी को
एक दूसरे की साँसों से गर्म करेंगे

कल्पनायें खुरदुरी जमीन पर
कहाँ दौड़ पाती हैं

तुम बुनती रही सपनों का शाल
और दिल्ली दरबार में रची जा रही थी
रुपये को, धर्म को, ईमान को
मार डालने की साजिशें

ऐसे खतरनाक समय में
प्रेम कहाँ जीवित रह पाता

जब कभी बहुत बैचेनियों से गुजरूँगा
तो ओढ़ लूंगा
तुम्हारा आसमानी शाल
और तुम भी
अब कभी बहुत घबड़ाओ
तो लपेट लेना
मेरा दिया हुआ वादों का मफ़लर----

"ज्योति खरे"

शुक्रवार, दिसंबर 15, 2017

प्रेम का पुनः अंकुरण

कुछ देर
मेरे पास भी बैठ लो
धूप में
पहले जैसे

जब खनकती चूड़ियों में
समाया रहता था इंद्रधनुष
मौन हो जाती थी पायल
और तुम
अपनी हथेली में
मेरी हथेली को रख
बोने लगती थी
प्रेम के बीज

अब जब भी बैठती हो मेरे पास
धूप में
छीलती हो मटर
तोड़ती हो मैथी की भाजी
या किसती हो गाजर

मौजूदा जीवन में
खुरदुरा हो गया है
तुम्हारा प्रेम
और मेरे प्रेम में लग गयी है
फफूंद

सुनो
अपनी अपनी स्मृतियों को
बांह में भरकर सोते हैं
शायद
बोया हुआ प्रेम का बीज
सुबह अंकुरित मिले -----

"ज्योति खरे"

सोमवार, नवंबर 13, 2017

दुख पराये नहीं होते

दुख पराये नहीं होते
बहुत खास होते हैं
अपनों से भी अधिक
जैसे
पुरुष के लिए प्रेमिका
स्त्री के लिए प्रेमी

प्रेम का रस
खट्टा मीठा होता है

एक चींटी
अपने सिर पर
अपने वजन से भी अधिक
बोझ रखकर जब दुखों से लड़ती
पहाड़ पर चढ़ कर
जीत की घोषणा करती है
विजेता उसी दिन बनती है----

" ज्योति खरे "

शनिवार, अक्तूबर 28, 2017

कागज में लिखा चाँद

कुछ कागज में लिखी स्मृतियाँ
कुछ में सपने
कुछ में सुख
कुछ में दुख
कुछ में लिखा चाँद

चांद रोटियों की शक्ल में ढल गया
भूख और पेट की बहस में
सपनो की सरसराती आवाजें
जंग लगे आटे के कनस्तर में समा गयीं

तुम्हारे खामोश शब्द
समुंदर की लहरों जैसा कांपते रहे
और मैं
प्रेम को बसाने की जिद में
बनाता रहा मिट्टी का घरोंदा

एक दिन तुम
शर्मीली ठंड में
अपने दुपट्टे में बांधकर जहरीला वातावरण
उतर आयी थी
मेरी खपरीली छत पर
चाँद बनकर ---

# ज्योति खरे