गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

शरद का चांद

शरद का चांद
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वर्षों से सम्हाले
प्रेम के खुरदुरेपन को
खरोंच डाला है
सपनों ने
दीवाल पर चिपका रखी हैं
खींचकर अनगिनत फ़ोटो
चांद की
और चांद है कि
आसमान से उतरकर
खरगोश की तरह
उचक रहा है इधर उधर

फक्क सुफेद चांद
जब भी उछलकर
तुम्हारी गोद में गया
तुमने झिड़क दिया

मैं हमेशा जमीन पर
उचकते खरगोश को सहलाता रहा
खरोंच और चोट से बचाता रहा
और समझाता रहा तुम्हें
यह खरगोश प्रेम का प्रतीक है
तुम नकारती रही
तुम्हें तो बस आसमान वाला
चांद चाहिए

कभी
जमीन पर रहने वाले चांद को
गोद में बैठाकर
प्रेम से
उसकी देह पर
उंगलियां तो फेरो

शरद का चांद
प्रेम में तरबतर हो जाएगा
तुम्हारे आँचल में
सदैव खिला रहेगा -----

"ज्योति खरे"

शनिवार, जुलाई 01, 2017

अम्मा का आज जन्मदिन है

पापा का पत्र अम्मा के नाम 


 पम्मी, आज मुझे जीवन के बारे में सोचने का मौका मिला है, मुझे पुराने दिन याद आ रहें हैं,गरीबी के दिन याद आ रहें हैं,वह दिन भी याद आ रहें हैं, जब तुम मेरी पत्नी बनकर आयी थी.
आज में दुबारा खुश हूँ,रात को सोया हूँ या जागा हूँ, कह नहीं सकता, या कोई सपना देखा है यह भी  नहीं बता सकता,पर इतना जानता हूँ कि जबलपुर फूटाताल से शुरू होकर अब तक की बीती हुई यांदें जो दुबारा नहीं जी जा सकतीं,उनमें  जी रहा हूँ.
आज ऊपर वाला दांत टूट गया, मुझे वह दिन याद आ गया, जब मैं और तुम छोटे थे,तुम लईया लेकर आ रही थी मैंने छीनने की कोशिश की थी, तुमने मुझे लात मारकर मुंह के बल गिरा दिया था,दांत पीला पड गया था,आज वही दांत गिर गया.बाद में पता चला था  उस दिन तुम्हारा जन्मदिन था.
मेरी और तुम्हारी उम्र जैसे-जैसे बढती गयी,तुममें और मुझमे प्यार भी बढ़ता गया.
एक दिन मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ तुम्हारे दरवाजे तुमसे ब्याह रचाने आ गया,वह क्षण याद आ रहा है जब तुम्हारे भाई ने मेरे सीने में बंदूक रख दी थी और तुमने चीख कर कहा था कि, मैं इस लड़के से शादी करुँगी, मैं तुम्हें अपनी दुल्हन बना कर ले आया,सामाजिकता से गिरे नहीं क्योंकि तुम और मैं
एक ही जाती के थे पर हुआ तो प्रेम विवाह ही था.
मैंने अपने प्रथम मिलन पर तुम्हें एक तस्वीर बना कर दी थी " परिचय का प्रथम क्षण" क्योंकि मैं एक चित्रकार था और यही मेरी रोजी रोटी थी
आज जी भरकर रोया भी हूँ और हंसा भी हूँ क्योंकि अपनी बेवकूफियों की वजह से अपने सुखों को गंवाता रहा. सम्पूर्ण जिन्दगी की यादें दुहरा रहा हूँ सोच रहा हूँ कि कुछ पल उसी जगह पर जाकर बिताऊं जहां तुमने और मैंने प्रेम के बीज बोये थे, बदल तो सब कुछ गया होगा पर नहीं बदली होंगीं सड़कें.
इस जेल ने नयी दिशा दी हैं,नयी आशाएं दी हैं. 


बच्चे बड़े और समझदार हो गएँ हैं सब तुम्हारे ऊपर गये हैं, स्वभाव और कर्म से 
मरने से पहले एक बार तुम्हारी गोद में सर रखकर बहुत देर तक रोना चाहता हूँ.
एक बात बोलूं ---
सुंदर तो तुम जब भी थी 
आज भी हो ---
सेन्ट्रल जेल 
जबलपुर 
15 मई 1974  

शनिवार, जून 17, 2017

पिता -----



अँधेरे को चीरते
सन्नाटे में 
अपने से ही बात करते पिता 
यह सोचते हैं कि कोई उनकी आवाज नहीं सुन रहा होगा 

मैं सुनता हूँ 

कांच के चटकटने सी 
ओस के टपकने सी 
पतली शाखाँओं से दुखों को तोड़ने सी 
सूरज के साथ सुख के आगमन सी 
इन क्षणों में पिता 
व्यक्ति नहीं समुद्र बन जाते हैं 

उम्र के साथ दिशा और दशा बदल जाती है 
नहीं बदलते पिता 
क्योंकि 
उनके जिन्दा रहने का कारण है 
आंसुओं को अपने भीतर रखने की जिद 

पिता 
जीवन के किनारे खड़े होकर 
नहीं सूखने देते कामनाओं का जंगल 
उड़ेलते रहते हैं अपने भीतर का समुद्र 

इसीलिए 
आंसुओं को समेटकर 
अपने कुर्ते में रखने वाले पिता 
अमरत्व के वास्तविक हकदार हैं ------

" ज्योति खरे "

सोमवार, जून 05, 2017

एक हरे पेड़ की तलाश


🔴🌴

निकले थे
गमझे में कुछ जरुरी सामान बांध कर  
किसी पुराने पेड़ के नीचे बैठकर
बीनकर लाये हुए कंडों को सुलगाकर
गक्क्ड़ भरता बनायेंगे
तपती दोपहर की छाँव में बैठकर
भरपेट खायेंगे

सूखे और विकलांग पेड़ों के पास से
एक हरे पेड़ की तलाश में
भटकते रहे

सोचा हुआ कहाँ पूरा हो पाता है

सच तो यह है कि
हमने
घर के भीतर से
निकलने और लौटने का रास्ता
अपनों को ही काट कर बनाया है ----

"ज्योति खरे"

सोमवार, सितंबर 12, 2016

बिटिया, जीत तो तुम्हारी ही होती है ----



सुबह होते ही
फेरती हो स्नेहमयी उंगलियाँ
उनींदी घास हो जाती है तरोताजा

गुनगुनाने की आवाज सुनते ही
निकलकर घोंसलों से
टहनियों पर पंख फटकारती
बैठ जाती हैं चिरैयां
बतियाने

मन ही मन मुस्कराती हैं 
जूही,चमेली,रातरानी
 

नाचने लगती हैं  
कांच के भीतर रखी
बेजान गुड़ियां भी
 

जलने को मचलने लगता है चूल्हा
जिसे तुम बचपन में
खरीद कर लायीं थी सावन के मेले से

पायलों की आहट सुनकर
सचेत हो जाता है आईना
वह जानता है
आईने के सामने ही खड़ी होकर
अपने होने के अस्तित्व को
सजते सवंरते स्वीकारती हो

तुम्हारे होने और तुम्हारे अस्तित्व के कारण ही
युद्ध तो आदिकाल से हो रहा है

जीत तो तुम्हारी ही होती है
ठीक वैसे ही , जैसे !!
काँटों के बीच से
रक्तिम आभा लिए
गुलाब की पंखुड़ियां निकलती हैं -------

बिटिया को जन्मदिन की स्नेह भरी शुभकामनाएं ----
                                  " ज्योति सुनीता खरे "




मंगलवार, फ़रवरी 09, 2016

अंधेरे में आया था




शंकाऐं ह्रदय तट पर
जमघट लगाएं
अरमान मरघट सजाऐं---

बांधकर
दाल दी है मैंने
गठरी में
यातनायें और पीड़ा
फिर भी रेंगता है
सूखे जलाशय का कीड़ा
अन्तःस्थल में
रेगिस्तान सी
जलती हुई बालू
रोम रोम झुलस रहा
मन चिंघाड़ रहा
आत्मसंतोष है
फिर क्यों सूख रहा तालू---
जीवन का दूसरा
पन्ना पलटना चाहता हूं
अतीत के इतिहास पर
व्यंग भरी हंसी
हंसना चाहता हूं---
ना जाने किस पाषाड़ से
जन्म पाकर
पत्थरों के शहर में
गिड़गिड़ा रहा हूं
खून अपना अमृत समझकर
पी रहा हूं----
शिवालय भी पत्थर के
पत्थर से बनते हैं
अपनी ही ममता को
अपने ही हांथों से पटकते हैं
शरीर से जुडी परछांई
मेरी पावन सहेली है
मेरी जिंदगी तो
अभावों के साथ खेली है----
यातनाऐं न होती तो
कामनाओं से न जूझता
कमनाऐं न होती तो
यातनाओं से न जूझता
अंधेरे में आया था
अंधेरे में जा रहा हूं
खून अपना अमृत
समझकर पी रहा हूं-----
                                     
"ज्योति खरे" 

चित्र- गूगल से साभार

सोमवार, अक्तूबर 26, 2015

शरद का चाँद बनकर ----

 
 
कुछ कागज में लिखी स्मृतियाँ
कुछ में सपने
कुछ में दर्द
कुछ में लिखा चाँद
 
चांद रोटियों की शक्ल में ढल गया
भूख और पेट की बहस में
गुम गयी
अंतहीन सपनो के झुरमुट में स्मृतियां
 
दर्द कराह कर
जंग लगे आटे के कनस्तर में समा गया
 
तुम्हारे खामोश शब्द
समुंदर की लहरों जैसा कांपते रहे
और मैं प्रेम को बसाने की जिद में
बनाता रहा मिट्टी का घरोंदा
 
और एक दिन तुम
अक्टूबर की शर्मीली ठंड में
अपने दुपट्टे में बांधकर जहरीला वातावरण
उतर आयी थी
शरद का चाँद बनकर
मेरी खपरीली छत पर


                                # ज्योति खरे 

चित्र--- गूगल से साभार